बुधवार, 1 जनवरी 2014

आओ इस नये साल मे


सुख दुख तो जीवन के साथी,
जीना हमें हर हाल मे
खुश रहने का वादा करलें,
आओ इस नये साल मे

क्या पाया क्या खोया हमने,
न उलझें इन सवाल मे
नई उम्मीदों से दामन भरले,
आओ इस नये साल मे

पनीर की कौशिश करें तब तक
काम चलाये दाल मे
आशाओं को दुगना कर लें ,
आओ इस नये साल मे

सुर से सुर मिलायें जीवन के
ताल देकर ताल मे
हर रंग को अपना कर लें ,
आओ इस नये साल मे

सैयाद हर तरफ मिलेंगे
फंसें न इनके जाल में
स्वविवेक से राहें चुनलें
आओ इस नये साल मे
सुरेश राय 'सरल'

चित्र गूगल से साभार

रविवार, 3 नवंबर 2013

कैसी दीवाली, कैसा उत्सव आधा देश जब भूखा है


क्या हुआ जो मजबूर कर दिया हमे मुंह के छालों ने
मुंह मीठा कर दिया मीठी शुभकामना भेजने वालों ने

क्या हुआ जो खरीद न सका मैं दीवाली के दिये
घर मेरा रोशन कर दिया पडोसी दियों के उजालों ने

क्या हुआ जो रंग रोगन न कर पाया मै दीवारों मे
धूल सारी हटा दी घर की बरस के बादल कालों न

झूम रहे थे खुशियों मे सब फोड़ फ़टाखे अपने घर
सरहद पर झेली आतिशबाजी देश के वीर लालों ने

बाजारों मे बहता पैसा जब इतनी मंहगाई के बाद
हक कितनों के लील गये भ्रष्टाचार और घोटालों ने

कोई तरसा बताशों को कोई छांट मिठाई खाता है
उपहारों से घर भर दिया अफसरों का दलालों ने

कैसी दीवाली, कैसा उत्सव आधा देश जब भूखा है
मुझको सोने न दिये रात भर मन के इन सवालों ने
सुरेश राय 'सरल'
04-11-2013

(चित्र गूगल से साभार )

शनिवार, 2 नवंबर 2013

दोहे :- दीपावली पर


दीपों से जगमग हुआ, सारा ये संसार
धरा से तम मिटाने का , आया ये त्यौहार

पधारो घर माँ लक्ष्मी, संग पधारो गणेश
पूरी हो कामनाऐं , मिटे सारे कलेश

महालक्ष्मी आन बसो ,निर्धन के घर आज
धन वैभव के बिना अब , होत न पूरे काज

फूलझडियाँ खुशियों की , उमंग के फोडें बम
हर मन मे हो रोशनी , मिटे जीवन से तम

होंगे तब रोशन यहाँ , रिश्तो से अंधकार
अना जलाऐं दीप मे , बांटे सब मे प्यार
सुरेश राय 'सरल'

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

अंधेरे रिश्तों से मिटाओ तो बात बने


अंधेरे रिश्तों से मिटाओ तो बात बने
रोशनी दिलों तक फैलाओ तो बात बने
यहाँ तेल और बाती से न होगा उजाला
दिये मे अना को जलाओ तो बात बने
सुरेश राय 'सरल'

(चित्र गूगल से साभार )

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

चौथ के चंद्रमा का मन भी ललचता है


चौथ के चंद्रमा का मन भी ललचता है
रूप मे जो तेरे आज एक नूर बरसता है।

छननी का परदा आज दरमियाँ जो है
वे परदा तुझे देखने चांद भी तरसता है।

हैरान है आकाश देख के धरा पे रोशनी
माथे पे सुहाग का टीका जो दमकता है।

कानों मे आकर रस घोल जाती है पवन
कलाईयों पे तेरे कंगना जो खनकता है।

शायद तेरे ही श्रृंगार से ईर्ष्या है चांद को
तभी तुझे चिढ़ाने वो देर से निकलता है।

तेरे कठिन व्रत के आगे झुकती कायनात
सत्य सावित्री से तो यम भी लरजता है। (लरजना =भयभीत होना )

सुरेश राय 'सरल'

(चित्र गूगल से साभार )

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

कोई पैमाना नही ,मनुष्य की प्यास का



कभी खुशी कभी मातम ,है प्रमाण आस का
अहसास न देखता पद, आम और खास का

कभी एक बूंद काफ़ी, कभी समंदर भी कम
कोई पैमाना नही है ,मनुष्य की प्यास का

मिलता नही जिगरे सिंह,औढ़ लो चाहे खाल
भूलना औकात अपनी,कारण बने उपहास का

खुद को गर न खोज सके,तुम अपनी उम्र भर
फायदा क्या है भला,बता तेरी ऐसी तलाश का

स्वप्न गढ़े पीढीयों के ,कल का न भरोसा कुछ
जाने कब टूट जाये, बंधन तन से सांस का

जिसने सहा वही रहा , मूल यही है संसार का
ज्येष्ठ की तपिश मे खिले,फूल ज्यों पलाश का

रिश्तो को रखना हरा, सींच के प्रेम नीर से
ॠतु की अना से पड़ता, पीला रंग घास का

कानों मे रस घोलने , मिटा देता खुद को
छेद पाकर सीने मे , इक तुकड़ा बांस का

न खीँच डोर संबंधों की, अपने अभिमान से
टूटे न धागा सुरेश, प्रेम और विश्वास का

सुरेश राय 'सरल'
(चित्र गूगल से साभार )

रविवार, 13 अक्टूबर 2013

कर्म अपने जो रावण ने सुधारा होता


कर्म अपना जो रावण ने सुधारा होता
वंश का नाश उसे गर ना गवारा होता
पैर अंगद के भी यूं ही वह हिला देता
मन मे भी अगर राम को पुकारा होता
सुरेश राय 'सरल'

(चित्र गूगल से साभार )