मंगलवार, 24 सितंबर 2013

मुझको भी जीवन का अधिकार दे हे माँ


यह एक अजन्मी बेटी भ्रूण की अपनी माँ से पुकार है. . .

मुझको भी जीवन का अधिकार दे हे माँ
ममता की मूरत का मुझे दीदार दे हे माँ

मुझमे तेरा अंश है मैं तेरी ही परछाई हूं
मुझको तू अपना सा ही आकार दे हे मां

अपने सपनों को माँ तो बेटी मे जीती है
अपने सपने अब तू साकार कर ले माँ

मैं तो हूं तन्हा यहाँ बस तू ही सहेली है
इस सहेली को जीवन उपहार मे दे माँ

न दुख की फिक्र मुझे न दर्द का है डर
दिल खोल अगर अपना तू प्यार दे माँ

जैसे तू चाहेगी वैसे रहना है मुझे मंजूर
बस मेरे जीवन को तू विस्तार दे हे माँ

जुल्मी जो रस्में है मुझे जीने नही देतीं
ऐसे रिवाजों को अब धिक्कार दे हे माँ

आज की बेटी क्या नही कर सकती ?
आजमाइश का मौका एक बार दे माँ

तू भी एक बेटी है तुझ पर भी कर्ज है
कर्ज इस तरह अपना उतार दे हे माँ

सुरेश राय 'सरल'


(चित्र गूगल से साभार)

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति...

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    1. आदरणीय शर्माजी, सह्रदय आभार व्यक्त करता हूं आपका. हार्दिक अभिनंदन

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  2. जैसे तू चाहेगी वैसे रहना है मुझे मंजूर
    बस मेरे जीवन को तू विस्तार दे हे माँ ..

    बहुत ही सुन्दर शेरों से सजी ... माँ को समर्पित गज़ल ... हर शेर माँ के ओर करीब ले जाता हुआ ...

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    1. आदरणीय नासवा जी, आप को रचना पसंद आई, मेरे प्रयास को हौसला मिला. सह्रदय आभार आपका

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - रविवार - 06/10/2013 को
    वोट / पात्रता - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः30 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


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  4. उत्तर
    1. आदरणीय कालीपद प्रसाद जी, आप को रचना पसंद आई, मेरे प्रयास को हौसला मिला. सह्रदय आभार आपका

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